मोदी-ट्रम्प टैरिफ युद्ध: भारत पर 50% शुल्क का प्रभाव और भविष्य की रणनीति

 


28 अगस्त, 2025 — भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक तनाव चरम पर पहुंच गया है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयातित वस्तुओं पर 50% टैरिफ लागू कर दिया है। यह शुल्क, जो 30 जुलाई को शुरू हुए 25% शुल्क से दोगुना है, रूस से तेल खरीदने के कारण भारत को "दंड" देने के लिए लगाया गया है। इस कदम ने भारत के निर्यात उद्योगों को झटका दिया है, विशेष रूप से कपड़ा, रत्न और आभूषण, और समुद्री खाद्य क्षेत्रों को। हालांकि, दवा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कुछ क्षेत्रों को छूट दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए इस चुनौती का सामना करने की बात कही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह "टैरिफ युद्ध" भारत की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकता है।

प्रभावित क्षेत्र और आर्थिक नुकसान

अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार, 2024 में 86.5 बिलियन डॉलर के सामान का आयात करता था। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, 50% टैरिफ के कारण 2026 तक भारत का निर्यात 50 बिलियन डॉलर तक गिर सकता है, जिससे लाखों नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हैं:

  • कपड़ा और परिधान: 10.8 बिलियन डॉलर के वार्षिक निर्यात के साथ, भारत का कपड़ा उद्योग 64% तक प्रभावी शुल्क का सामना कर रहा है। तमिलनाडु के तिरुपुर क्लस्टर, जहां 6 लाख से अधिक लोग काम करते हैं, में ऑर्डर रद्द होने और छंटनी की आशंका बढ़ गई है।
  • रत्न और आभूषण: सूरत से 9.94 बिलियन डॉलर का निर्यात अब 52.1% शुल्क के अधीन है, जिससे भारत की हीरा प्रसंस्करण इकाइयों पर संकट मंडरा रहा है।
  • समुद्री खाद्य: 2.4 बिलियन डॉलर के समुद्री खाद्य निर्यात, विशेष रूप से झींगा, पर 60% शुल्क लागू है, जिससे भारत इक्वाडोर जैसे प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ सकता है।
  • ऑटो कंपोनेंट्स: 6.6 बिलियन डॉलर के ऑटो पार्ट्स निर्यात में से 3.4 बिलियन पर 25% और शेष पर 50% शुल्क लागू है, जिससे भारत का 40% बाजार हिस्सा खतरे में है।
  • कृषि और रसायन: 6 बिलियन डॉलर के बासमती चावल, चाय, और मसालों सहित अन्य क्षेत्रों पर 50% शुल्क का बोझ पड़ेगा।

ये टैरिफ भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को सबसे अधिक प्रभावित करेंगे, जो निर्यात क्षमता का 70% से अधिक हिस्सा हैं। पतले मार्जिन पर काम करने वाले ये उद्यम उत्पादन में कटौती और नौकरियों के नुकसान का सामना कर रहे हैं।

छूट प्राप्त क्षेत्र: दवा और इलेक्ट्रॉनिक्स

कुछ क्षेत्रों को इस टैरिफ से छूट दी गई है। भारतीय दवा उद्योग, जो अमेरिका को 8.7 से 12.7 बिलियन डॉलर की जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है, को इसकी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण छूट दी गई है। यह उद्योग अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली को 2022 में 219 बिलियन डॉलर की बचत कराने में सहायक रहा। इलेक्ट्रॉनिक्स, जिसमें 14.64 बिलियन डॉलर के निर्यात जैसे भारत में असेंबल किए गए iPhone शामिल हैं, भी मौजूदा द्विपक्षीय समझौतों के तहत छूट प्राप्त हैं। पेट्रोलियम उत्पाद (4.1 बिलियन डॉलर) और कुछ धातुओं को भी राहत दी गई है। कुल मिलाकर, भारत के 27.6 बिलियन डॉलर के निर्यात, यानी 30%, शुल्क-मुक्त रहेंगे।

हालांकि, छूट के बावजूद, अजंता फार्मा, ल्यूपिन, और सन फार्मा जैसे दवा स्टॉकों में 28 अगस्त को गिरावट देखी गई। विश्लेषकों का कहना है कि यह बाजार की अनिश्चितता और भविष्य में अमेरिकी दबाव के डर के कारण है, जिसमें ट्रम्प ने दवा उत्पादन को अमेरिका में स्थानांतरित करने की चेतावनी दी है।

मोदी की प्रतिक्रिया और आत्मनिर्भरता की रणनीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस टैरिफ युद्ध को एक अवसर के रूप में लिया है, जिसमें उन्होंने "मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत" पर जोर दिया। एक हालिया रैली में, मोदी ने कहा, “हम अपने किसानों, छोटे उद्योगों और युवाओं के रोजगार के हितों की रक्षा करेंगे। मुझे भारी कीमत चुकानी पड़े, मैं इसके लिए तैयार हूं।” सरकार ने निर्यातकों के लिए कर राहत और वित्तीय सहायता की घोषणा की है, साथ ही लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व जैसे वैकल्पिक बाजारों की तलाश शुरू की है।

मोदी ने स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए भी अपील की, जिसमें उन्होंने कहा, “हम जो भी खरीदें, वह भारतीय मेहनत से बना होना चाहिए।” इसके साथ ही, सरकार ने दीपावली तक जीएसटी सुधारों और दरों में कटौती की घोषणा की है, जिसे उद्योग ने घरेलू खपत को बढ़ाने के कदम के रूप में स्वागत किया है।

भू-राजनीतिक संदर्भ और भविष्य की चुनौतियां

टैरिफ का मूल कारण भारत का रूस से तेल आयात है, जो यूक्रेन संकट के बाद से 1% से बढ़कर 37% हो गया है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने भारत पर “रूस के युद्ध से मुनाफा कमाने” का आरोप लगाया, जिसे भारत ने खारिज करते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों का हवाला दिया। भारत ने यह भी तर्क दिया कि चीन और यूरोपीय संघ जैसे अन्य देश भी रूसी ऊर्जा आयात करते हैं, लेकिन उन्हें कम जांच का सामना करना पड़ता है।

विश्लेषकों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था इस झटके को सहन कर सकती है, क्योंकि इसका निर्यात-से-जीडीपी अनुपात कम है और घरेलू मांग मजबूत है। फिच और मॉर्गन स्टेनली ने FY26 के लिए 6.5% जीडीपी वृद्धि का अनुमान लगाया है। हालांकि, अमेरिकी बाजार में हिस्सेदारी का नुकसान ग्रामीण रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास को धीमा कर सकता है।

आगे की राह

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है, और ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि जब तक टैरिफ का मुद्दा हल नहीं होता, कोई नई बातचीत नहीं होगी। इस बीच, भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने का संकेत दिया है, जिसमें मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हालिया फोन कॉल शामिल है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह टैरिफ युद्ध भारत को रूस, चीन और BRICS देशों के साथ गठजोड़ को और गहरा करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

जैसा कि भारत इस व्यापारिक संकट से जूझ रहा है, निर्यातकों को सलाह दी जा रही है कि वे बाजारों में विविधता लाएं और लागत को सुव्यवस्थित करें। सरकार की ओर से प्रभावित क्षेत्रों के लिए लक्षित सहायता महत्वपूर्ण होगी। यह टैरिफ युद्ध भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जिसका असर आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को फिर से परिभाषित कर सकता है। 

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