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दलित राजनीति और जातीय ध्रुवीकरण सिर्फ़ 2019 की तैयारी है?




पिछले हफ्ते राष्ट्रव्यापी दलित विरोध भारत के संघर्षों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। दलित-बंद के दौरान और उसके बाद में कई लोग हिंसा का शिकार हुए थे ! अचानक से यह जातीय ध्रुवीकरण की कोशिश क्यों होने लगी ? कौन है इसके पीछे ? दलित बंद और उसके इर्दगिर्द जो कुछ भी हुआ उसकी ख़ुद बीजेपी के कुछ दलित नेता निंदा कर रहे हैं और ये मामला वो ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचाने की भी कोशिश कर रहे हैं ! मायावती ने पहले ही भाजपा के दोनों केंद्र और राज्य सरकारों पर दलितों पर बढ़ने वाले अत्याचार के मामलों हमला शुरू कर दिया है । पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा कि देश में अल्पसंख्यकों एवं दलितों के उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही हैं और यदि इन पर लगाम नहीं लगाई गई तो लोकतंत्र को नुकसान हो सकता है. उन्होंने ‘विभाजनकारी नीतियों एवं राजनीति’ को खारिज करने का आह्वान भी किया.

दलितों का एक वर्ग ने बीजेपी को इसलिए वोट किया था क्योकि उनका मानना था कि नरेंद्र मोदी जो ओबीसी की पृष्ठभूमि में हैं, वे उनके सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक स्थितियों में सुधार कर सकते हैं। आरक्षण के मुद्दे को लेके दलित हमेशा से बीजेपी और आरएसएस से डरते आये है !


अनुसूचित जाति (अनुसूचित जाति) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) मिलकर भारत की आबादी के 20 प्रतिशत से अधिक का गठन करते हैं - लगभग 250 करोड़ लोग देश में सबसे वंचित समूह के रूप में रहते आये है ! वे लंबे समय से भारत में नफरत अपराधों और भेदभाव का शिकार बनते रहे हैं, इन प्रदर्शनों से लगता है की दलित समुदाय सरकार से कुश नहीं है और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सत्ता में आने के बाद उनकी स्थिति अधिक खराब हो गई। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 यानि SC-ST एक्ट को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है, और इसके बाद कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी कर दिए। इसके बाद कई दलित संगठनों में रोष पैदा हो गया है। यहां तक कि राजनैतिक दल भी इस पर राजनीति करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष ने दबाव बनाया, जिसके बाद अब केंद्र सरकार ने रिव्यू पिटीशन दाखिल कर दी है।


लेकिन एक विचार ये भी है कि एससीएसटी उत्पीड़न क़ानून में सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से जो दिशा-निर्देश जारी हुए उसमें केंद्र सरकार की सुस्ती जानबुझकर रही ! 2 अप्रैल को भारत के दलितों के सैकड़ों हजारों लोग भारत बंद में हिस्सा लेने के लिए सड़कों पर उतर गए,यह हड़ताल पूरे भारत में दलित संगठनों द्वारा बुलाई गई थी । इतना बड़े पैमाने पर विरोध अपनी तरह का पहला था, पहले यह शांतिपूर्ण था - प्रदर्शनकारियों ने सड़कों को अवरुद्ध कर दिया, बैठकों में भाग लिया और नारे लगाए। इस प्रदर्शन ने कम से कम 11 लोगो की जान ले ली , उनमें से ज्यादातर दलित समुदाय से मारे गए थे। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में बीफ के लिए गायों की व्यापार या वध करने वाले SC/ST समुदायों के सदस्यों के खिलाफ 38 हमले हुए और कम से कम 10 लोग मारे गए ! ये हमले मुख्यतः हिन्दू संघठनो द्वारा किआ गया था ! दलितों के ऊपर काननू रहते इतने अत्याचार होता है और जब ये हटा दिया जायेगा तो सोचिये स्तिथि क्या होगी ! भारत की आजादी एवं स्वतंत्रता बरकरार रखने की प्रतिबद्धता पर फिर से जोर देने की जरूरत है.


जानें क्या है ये एक्ट इस एक्ट के तहत आने वाले अपराध
  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के खिलाफ होने वाले क्रूर और अपमानजनक अपराध, जैसे उन्हें जबरन मल, मूत्र इत्यादि खिलाना
  • उनका सामाजिक बहिष्कार करना
  • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्य से व्यापार करने से इनकार करना
  • इस वर्ग के सदस्यों को काम ना देना या नौकरी पर ना रखना
  • शारीरिक चोट पहुंचाना या उनके घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करने या क्षुब्ध करने की नीयत से कूड़ा-करकट, मल या मृत पशु का शव फेंक देना
  • बलपूर्वक कपड़ा उतारना या उसे नंगा करके या उसके चेहरें पर पेंट पोत कर सार्वजनिक रूप में घुमाना
  • गैर कानूनी-ढंग से खेती काट लेना, खेती जोत लेना या उस भूमि पर कब्जा कर लेना
  • भीख मांगनें के लिए मजबूर करना या बंधुआ मजदूर के रूप में रहने को विवश करना
  • मतदान नहीं देने देना या किसी खास उम्मीदवार को मतदान के लिए मजबूर करना
  • महिला का उसके इच्छा के विरूद्ध या बलपूर्वक यौन शोषण करना
  • उपयोग में लाए जाने वालें जलाशय या जल स्त्रोतों का गंदा कर देना अथवा अनुपयोगी बना देना
  • सार्वजनिक स्थानों पर जाने से रोकना
  • अपना मकान अथवा निवास स्थान छोड़नें पर मजबूर करना 
इस अधिनियम में ऐसे 20 से अधिक कृत्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए हैं।

इन अपराधों के लिए दोषी पाए जाने पर 6 महीने से लेकर 5 साल तक की सजा और जुर्माने तक का प्रावधान है। इसके साथ ही क्रूरतापूर्ण हत्या के अपराध के लिए मृत्युदण्ड की सजा का भी प्रावधान है। अगर कोई सरकारी कर्मचारी/अधिकारी जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं, अगर वह जानबूझ कर इस अधिनियम के पालन करनें में लापरवाही करता हैं तो उसे 6 माह से एक साल तक की सजा दी जा सकती हैं।

इस लेख में लेखक के व्यक्तिगत विचार   हैं और जरूरी नहीं कि इंटेलीजेंट इंडिया   के संपादकीय दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।



बिपिन ससि इंटेलिजेंट इंडिया हिंदी के लिए, बंगलुरु से